सतीश सेठी /ब्यूरोचीफ /सहारनपुर / सनसनीसुराग न्यूज़ (भंडारा :- दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान ,सहारनपुर के तत्वाधान मे सत्संग कार्येक्रम

सतीश सेठी /ब्यूरोचीफ /सहारनपुर / सनसनीसुराग न्यूज़
भंडारा :- दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान ,सहारनपुर
दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान के तत्वाधान मे सत्संग कार्येक्रम आयोजित किया गया जिसमे नूरमहल(जालंधर )पंजाब से श्री आशुतोष महाराज जी की शिष्या साध्वी मनेन्द्रा भारती जी ने अपने मुखार्विन से गुरु की कृपा से अपने विचारो को संगत के सामने रखे ! और अपने प्रवचनों मे बताया की एक शिष्ये अपने गुरु की आज्ञा मे चलकर अपने गुरु को कैसे प्रसन कर सकता है !
एक बार एक शिष्य जिज्ञासा लेकर अपने गुरु के पास आया! उसने गुरु के श्री चरणों में विनम्र भाव से एक प्रश्न रखा:- ,”गुरुवर “एक शिष्य अपने गुरु की आज्ञा का अनवरत पालन कैसे कर सकता है !गुरुदेव मुस्कुराते हुए उसे दो पड़ोसी राजाओं की कथा सुनाते हैं एक और राजा बलभद्र और दूसरी और राजा धर्मराज !बलभद्र का राज्य और सेना धर्मराज के मुकाबले अत्यंत विशाल थे ,फिर भी राजा बलभद्र के मन में यह विचार उठा कि उन्हें पड़ोसी राज्य पर आक्रमण कर उसे अपने राज्य में शामिल कर लिया जाए, इससे मेरे राज्य का विस्तार हो जाएगा! उसने अपनी यह भावना अपने राजगुरु से सांझा की !राजगुरु बोले हे राजन ,आक्रमण से पहले आप अपने किसी विश्वसनीय शुभचिंतक को पड़ोसी राजा के पास भेज कर संधि का प्रस्ताव रखें !संभावित व स्वयं ही आत्म समर्पण कर दे !इससे बिना किसी हानि के युद्ध भी टल जाएगा और आपकी इच्छा पूर्ति भी हो जाएगी !बलभद्र ने मन ही मन सोचा मेरा शुभचिंतक और जो विश्वसनीय भी हो ,मुझसे बढ़कर भला कौन हो सकता है !इसलिए वह भेष बदलकर एक दूत के रूप में पड़ोसी राजा से मिलने चल दिया !
राजा धर्मराज के समक्ष बलभद्र ने दूत के वेश में जैसे ही अपने राजा की कुचेष्टा जाहिर की, राजा धर्मराज मुस्कुराए और बोले :-तुम्हारे राजा के प्रस्ताव को स्वीकार करने से पहले मैं तुम्हें कुछ दिखाना चाहता हूं! राजा ने ताली बजाई उनका एक सैनिक तुरंत आया ,राजा ने उससे कहा इस पहाड़ी से नीचे कूद जाओ !सैनिक ने बिना कुछ पूछे वहां से छलांग लगा दी फिर राजा ने पुनः ताली बजाई दूसरा सैनिक आज्ञा पूर्ति हेतु आगे आया !यह क्या दूसरे को भी वही आज्ञा और वह भी बिना एक पल गवाये नीचे कूद पड़ा ! वही भयावह आज्ञा ,तीसरी बार ताली बजाई तीसरा सैनिक भी कूद गया !राजा बलभद्र अपने आपे में नहीं रहा और बोला यह कैसी क्रूरता है आज्ञा के नाम पर कोरी नृशंता है !पाप है पाप!
आखिर तुम इससे साबित क्या करना चाहते हो !गुस्से के आवेग में वह भूल गया था कि एक दूत कभी राजा से इतने ऊंचे स्वर में बात नहीं कर सकता !
राजा धर्मराज ने कहा मैं जानता हूं कि तुम कोई और नहीं स्वयं राजा बलभद्र हो !रुको एक् क्षण फिर राजा पुने ताली बजाते हैं और तीनों सैनिक वापस आ जाते हैं !राजा बताते हैं मैंने पहले ही नीचे जाल बिछाया हुआ था !जिसका इन तीनों को जरा भी अंदाजा नहीं था इससे मैं यह सिद्ध करना चाहता हूं कि जब तक मेरे पास ऐसे स्वामी भक्त योद्धा है तब तक कोई मेरे राज्य का बाल भी बांका नहीं कर सकता फिर धर्मराज ने अपने उन तीनों सैनिकों को उच्च पद से सुशोभित किया और बेशुमार धन पुरस्कार दिया राजा बलभद्र अपना सा मुंह लिए अपने राज्य वापस लौट आया वहां पहुंचते ही उसने भी हु बहु वही आजा दोहराई पर अफसोस एक भी सैनिक आगे नहीं आया उल्टा राजा से ही सब कुतर्क करने लगे यह कहानी सुना कर गुरुदेव ने अपने शिष्य से कहा जानते हो राजा धर्म राजा धर्मराज के तीन सैनिक किसके प्रतीक है यह कोई और नहीं हमारा तन ,मन और धन है !एक सच्चा शिष्य वही है जो गुरु आज्ञा में अपना तन मन और धन न्योछावर कर देता है पूर्ण समर्पण करता है कोई तर्क वितर्क नहीं करता!
और जब हम ऐसा करते हैं तो गुरुदेव अपनी कृपा की वर्षा हम पर भी कर देते हैं आध्यात्मिक संपदा के भंडार खोल देते हैं तो गुरु आज्ञा का चलने का एक ही मार्ग है पूर्ण समर्पण!
साध्वी सर्वसुखि भारती , हीना भारती जी ने भजनो का गायन किया ! और सँगत ने भजनो का पूरा आनंद लिया !
कार्य -कर्म की समाप्ति पर सहारनपुर आश्रम की कोर्डिनेटर साध्वी अम्बालिका भारती जी ने अंत मे सभी का आभार व्यक्त किया और तदुपरांत भंडारा प्रसाद का वितरण हुआ !

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